नीला और खोया हुआ तारा
नीला और जुगनू फ़्लिक एक छोटे तारे को घर पहुँचाने निकलते हैं, लेकिन उनकी पतंग को सही हवा चाहिए।
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एक खाली जगह

नीला को शाम का वह समय अच्छा लगता था जब वेधशाला की खिड़कियाँ सुनहरी और पहाड़ नीला हो जाता था। वह तालाब में पहले तारों की परछाइयाँ देखने आई थी। फ़्लिक घास के ऊपर टिमटिमाता साथ चल रहा था।
आज तारों का एक जाना-पहचाना झुंड अलग लग रहा था। टेढ़ी कतार थी, उसके सिरे पर चमकीला तारा भी था, मगर बीच में थोड़ी जगह खाली थी।
“क्या मैं कोई तारा भूल गई हूँ?” नीला ने सोचा।
फ़्लिक किनारे की ओर उतरा। उसके पास एक और रोशनी थी जो बिल्कुल नहीं टिमटिमा रही थी। घास के बीच कुछ चमक रहा था।
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घास में मेहमान

नीला एक छोटे तारे के पास बैठ गई। उसका एक सिरा मुड़ी हुई घास के नीचे अटका था। वह पत्ती के नीचे अपनी रोशनी बिखेर रहा था।
नीला ने घास हटाई। तारा थोड़ा उठा, फिर उसकी दोनों हथेलियों में आ ठहरा। उसे उठाना आसान था, पर अपने घर जाने के लिए उसे और ऊँचाई चाहिए थी।
फ़्लिक ने एक चक्कर लगाया। ऊपर आसमान में वही खाली जगह थी।
“वहाँ?” नीला ने पूछा। उसकी उँगलियों के बीच तारा और चमक उठा।
नीला ने हथेलियों से विशाल आसमान तक देखा। “अच्छा, तुम्हें उड़ने की अच्छी शुरुआत दिलानी होगी।”
आसमान की टोकरी

वेधशाला के दरवाज़े पर नीला को अपनी छोटी टोकरी मिली, जिसमें वह चीड़ के फल रखती थी। उसने तीनों फल निकाल दिए, देखा कि कुछ नुकीला तो नहीं बचा, और भीतर नरम रूमाल बिछा दिया।
तारा बीच में बैठ गया। टोकरी की बुनावट के हर छोटे छेद से रोशनी निकलने लगी। फ़्लिक उसके ऊपर ऐसे मंडराया जैसे नया दीपक जाँच रहा हो।
“सफ़र वाला कमरा,” नीला ने कहा।
उसने हत्थे से टोकरी उठाई। टोकरी सीधी रही और चलने पर भी तारा रूमाल में टिका रहा। मेहमान को ले जाने का इंतज़ाम हो गया था। आसमान तक पहुँचाना अभी बाकी था।
हरी-नीली पतंग

उसकी हरी-नीली पतंग दरवाज़े के पास टिकी थी। अच्छी हवा में वह वेधशाला की छत से भी ऊपर चढ़ जाती थी, जैसे बादलों ने उसे बुलाया हो।
नीला ने पतंग घास पर रखी। दो छोटे फंदों से टोकरी उसके बीच के हिस्से के नीचे बाँधी और पतंग उठाकर संतुलन देखा। टोकरी सीधी लटकी। ऊपर से वह खुली थी, ताकि तारा बाहर उठ सके।
फ़्लिक थोड़ी देर उसकी मुड़ी पूँछ पर बैठा।
“तुम साथ-साथ उड़ सकते हो,” नीला ने कहा। “इस कमरे में और सवारी नहीं।” उसने डोर की चरखी उठाई। हल्की हवा ने उसकी बाँह छुई।
बस घास से ज़रा ऊपर

नीला हवा की ओर मुड़ी और पतंग उठाई। उसकी पूँछ सीधी हुई। टोकरी इतनी ऊपर उठी कि नीचे घास पर तारे की रोशनी पड़ने लगी।
“चलो, उड़ो!”
उसने थोड़ी डोर छोड़ी। तीन साँसों जितनी देर तक पतंग ऊपर चढ़ी। फिर वेधशाला की दीवार के पीछे हवा थम गई। पूँछ झुक गई और टोकरी नीचे आने लगी।
नीला ने डोर खींची नहीं। वह टोकरी की ओर बढ़ी, डोर ढीली रखी और खाली हाथ आगे किया। घास को छूने से पहले ही तारे का कमरा उसकी हथेली पर आ टिका। फ़्लिक हत्थे के पास बेचैनी से चमका।
पतंग टूटी नहीं थी

नीला ने सब नीचे रखा और गाँठें देखीं। वे मज़बूत थीं। कागज़ फटा नहीं था। टोकरी झुकी भी नहीं थी और तारा नरम बिछौने में चमक रहा था।
“तो गड़बड़ कहाँ हुई?” उसने धीरे से कहा।
दीवार के पास की घास मुश्किल से हिल रही थी। लेकिन पगडंडी पर ऊपर एक ऊँची घास की बाली लगातार झुकी थी। फ़्लिक उधर गया तो उसकी उड़ान भी सँभल गई।
नीला ने पतंग की पूँछ का सिरा उठाया। यहाँ वह बस लटक रहा था। ऊपर हवा घास को एक दिशा में खींच रही थी। शायद पतंग नहीं, कोशिश करने की जगह बदलनी थी।
हवा की तलाश में

पतंग मोड़ने से पहले उसने टोकरी खोल ली। एक हाथ में टोकरी और दूसरी बाँह के नीचे पतंग लेकर वह जानी-पहचानी पगडंडी पर चढ़ी। फ़्लिक आगे उड़ता, और जब वह रुकती तो वह भी ठहर जाता।
रास्ता वेधशाला की खिड़कियों के पास से घूमकर पहाड़ी की चौड़ी घास वाली जगह पर पहुँचा। नीला ढलान से दूर रही। यहाँ खड़े होने, सामान रखने और हवा के लिए खूब जगह थी।
हवा उसके कोट को लगातार खींच रही थी। घास भी उसी दिशा में झुकी थी। “यहाँ बात अलग है,” उसने कहा। उसके हाथ में टोकरी तारे की रोशनी से चमक रही थी।
ऊपर जाने की जगह

नीला ने पतंग खोली और टोकरी फिर उसके नीचे बाँधी। दोनों फंदे जाँचे। फिर पूँछ के हवा में सीधा होने का इंतज़ार किया।
इस बार उसने जल्दी नहीं की। पतंग को स्थिर हवा में उठाया और डोर थोड़ी-थोड़ी छोड़ने लगी। टोकरी बिना डगमगाए ऊपर गई। फ़्लिक घास से कुछ ऊपर तक साथ उड़ा, फिर नीला के कंधे के पास लौट आया।
हरी-नीली पतंग और ऊँची चढ़ी। तारे की रोशनी से टोकरी की बुनी दीवारें सुनहरी हो गईं। नीला के पैर ज़मीन पर टिके रहे। उसकी नज़र पहाड़ के ऊपर आसमान की खाली जगह पर थी।
तारे की अपनी जगह

आखिर तारा रूमाल से ऊपर उठा। टोकरी के खुले हत्थे के पार आया और पतंग के पास एक छोटे चमकीले बिंदु की तरह ठहरा।
नीला ने डोर स्थिर रखी। “आगे का रास्ता तुम जानते हो।”
तारा और ऊपर गया। उसकी रोशनी छोटी होती गई, फिर पहाड़ के ऊपर टेढ़ी कतार से जा मिली। एक पल को पूरा झुंड साथ चमकता लगा। खाली जगह अब खाली नहीं थी।
नीचे हरी-नीली पतंग से खाली टोकरी हल्के-से झूल रही थी। नीला ने साँस छोड़ी और चरखी पर डोर लपेटने लगी। मेहमान घर पहुँच गया था। अब उसका सफ़र वाला कमरा वापस लाना था।
खाली टोकरी घर आई

पतंग धीरे-धीरे नीला के हाथों तक आ गई। उसने खाली टोकरी खोली, हरी-नीली पतंग मोड़ी और ढीली डोर समेट ली। रूमाल पर अब बस हल्की चाँदनी थी।
घर लौटते हुए वह फिर तालाब के पास रुकी। पानी में सारे जाने-पहचाने तारे झलक रहे थे। फ़्लिक उसके गाल के पास टिमटिमाया। इस छोटी रोशनी को कहीं और नहीं जाना था।
“शुभरात्रि, ऊपर वाले दोस्त,” नीला ने फुसफुसाकर कहा।
उसने खाली टोकरी कोट से लगा ली। फ़्लिक की छोटी रोशनी के पीछे आखिरी कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर वह दरवाज़े तक पहुँच गई। समाप्त।
About this Neutoons edition
An original Neutoons story, illustrated for shared reading in English and Hindi.
Neutoons English and Hindi text. AI-generated illustrations. Animated illustrations are available in the page-turning reader. The ten-page edition has no audio narration.



