शुभरात्रि, नन्हे जंगल
सोने से पहले ऑलिव को एक छोटी सैर करनी है। मम्मा उल्लू साथ चलती हैं—और जंगल की हर चीज़ को ठीक करना ज़रूरी नहीं।
मुफ़्त पढ़ें · दस सचित्र पन्ने · खाते की ज़रूरत नहीं
लगभग तैयार

ऑलिव को अपना नीला कंबल मिल गया था। उसने सोने की मुलायम जगह फुला ली थी। उसकी हरी बंडी ठीक थी, नन्हे पैर गरम थे और मम्मा उल्लू ने सब सामान रख दिया था। अब आराम से लेटने के अलावा कोई काम नहीं था।
मगर ऑलिव गोल खिड़की तक गई। बाहर रास्ता फ़र्न के पास मुड़कर जड़ों के पीछे खो जाता था। “क्या हमने फ़र्न को शुभरात्रि कहा?” उसने पूछा।
“अभी नहीं,” मम्मा ने कहा।
“और पत्थरों को?”
“हर पत्थर को नहीं।” ऑलिव ने दरवाज़े की ओर देखा। पूरी तरह तैयार होने से लगभग तैयार होना आसान लगता था। शायद एक छोटी बात जाँचनी बाकी थी।
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एक शांत चक्कर

मम्मा उल्लू खिड़की के पास आईं। “साथ में एक शांत चक्कर लगा लें? फ़र्न के पास से, पत्थरों के साथ-साथ, फिर घर।”
ऑलिव ने एक पंख से छोटा रास्ता बनाया। शुरुआत दिख रही थी और उसे पता था कि वह कहाँ खत्म होगा। “बस एक चक्कर,” उसने हामी भरी।
उन्होंने कंबल इंतज़ार करता छोड़ दिया। मम्मा ने खोखले पेड़ का दरवाज़ा खोला। शाम की ठंडी हवा ने ऑलिव का चेहरा छुआ। दरवाज़े से जंगल वैसा नहीं दिखता था जैसा शीशे के पीछे से। जानी-पहचानी आकृतियाँ अब नरम थीं। ऑलिव मम्मा के पास रही, इतनी पास कि बाहर कदम रखते समय उनके पंख छू गए।
अगले कदम की रोशनी

मम्मा छोटी पीतल की लालटेन लाईं और उसका हत्था ऑलिव को दिया। ऑलिव के अच्छी तरह पकड़ने के बाद ही उन्होंने छोड़ा। गरम रोशनी ने उनके बीच ज़मीन पर घेरा बनाया।
ऑलिव ने पूरा रास्ता एक साथ रोशन करने के लिए लालटेन ऊँची उठाई। वह डगमगाई, इसलिए उसने फिर नीचे कर ली। पैरों के पास पत्थर साफ़ दिखने लगे। दूर पेड़ों की चोटियाँ चाँद देख सकता था।
“जहाँ हम जा रहे हैं, उसके लिए इतनी रोशनी काफ़ी है,” मम्मा ने कहा। ऑलिव ने एक सावधान कदम रखा, फिर दूसरा। छोटा घेरा साथ चला। उसे ऑलिव से पहले रास्ते के अंत तक पहुँचने की ज़रूरत नहीं थी।
फ़र्न को शुभरात्रि

दरवाज़े के पास की फ़र्न रास्ते पर झुकी थी। उसकी लंबी हरी उँगलियों पर शाम की नमी की नन्ही बूँदें थीं। ऑलिव उसके सामने रुकी। “शुभरात्रि,” उसने फुसफुसाया।
हवा चली तो एक पत्ती हिली। ऑलिव मुसकराई, जैसे उसने जवाब में हाथ हिलाया हो। वह बूँदें झाड़ने को पंख बढ़ाने वाली थी, फिर लालटेन में उन्हें चमकते देखा। फ़र्न जैसी थी, आराम में लग रही थी।
मम्मा ने बिना जल्दी किए इंतज़ार किया। रोशनी के बाहर एक छोटा पतंगा गुज़रा और नीले अँधेरे में खो गया। ऑलिव ने आँखों से उसका पीछा किया, फिर पत्थरों की ओर मुड़ी। फ़र्न अपनी बूँदें रख सकती थी।
रास्ते में टहनी

अगले चिकने पत्थर पर एक छोटी गिरी टहनी पड़ी थी। उस पर पैर रखने से पहले ऑलिव रुक गई। यह ऐसी चीज़ थी जिसे हटाने से किसी उगती चीज़ को छेड़ना नहीं पड़ता।
उसने लालटेन मम्मा को दी और दोनों पंखों से टहनी उठाई। रास्ते के पास जड़ के नीचे दूसरी गिरी टहनियाँ थीं। ऑलिव ने अपनी वहीं रख दी और चलने वाला पत्थर खाली हो गया।
मम्मा ने लालटेन लौटाई। रोशनी ने दिखाया कि क्या बदला था—पैर रखने की एक साफ़ जगह और अपनी साथियों के पास एक टहनी। ऑलिव खुश हुई। उसे पूरा जंगल साफ़ करने की ज़रूरत नहीं थी। इतना रास्ता काफ़ी था।
पास की सरसराहट

वे घर की ओर मुड़ने ही वाली थीं कि ऑलिव के पैरों के पास कुछ सरसराया। उसने लालटेन अपनी बंडी के पास खींची और रुक गई। आवाज़ भी रुक गई।
“यह क्या था?” उसने बहुत धीरे पूछा।
मम्मा उसके पास आ गईं, जवाब ढूँढ़ने के लिए आगे नहीं दौड़ीं। “यहीं से देखते हैं।”
पीछे गोल दरवाज़ा अब भी दिख रहा था। ऑलिव जानती थी कि वह कहाँ है। मम्मा पास थीं। उसने लालटेन थोड़ा-थोड़ा नीचे की, जब तक रोशनी रास्ते के किनारे न पहुँची। कुछ उछलकर बाहर नहीं आया। दो पत्थरों के बीच भूरी आकृति थी, लगभग उनकी परछाइयों जैसी।
बस एक पत्ती

हवा फिर आई। भूरी आकृति एक कोने से उठी, पलटी और बैठ गई। वह सूखी पत्ती थी, छोटी नाव जैसी मुड़ी हुई। उसका किनारा पत्थर से धीरे रगड़ा—वही आवाज़ जो ऑलिव ने सुनी थी।
“ओह,” उसने कंधे ढीले करते हुए कहा। “तो तुम हो।”
मम्मा देखती रहीं और ऑलिव ने कुछ देर और गौर किया। पत्ती फँसी नहीं थी। उसे घर ले जाने की ज़रूरत नहीं थी। हवा चली थी, इसलिए वह हिली थी।
“तुम्हें भी शुभरात्रि,” ऑलिव फुसफुसाई। उसने लालटेन चलने जितनी ऊँचाई पर कर ली। अब वह जानती थी कि यह क्या है। छोटा रहस्य रास्ते के पास रह सकता था।
लौटने का रास्ता

लौटते समय ऑलिव ने वह साफ़ पत्थर देखा जहाँ टहनी थी। वह बिना रुके आगे बढ़ गई। फ़र्न पर अब भी बूँदें थीं और छोटा पतंगा अपनी राह चला गया था।
“बड़ी जड़ के पार भी देखें?” उसने पूछा। सवाल के बीच ही जम्हाई आ गई।
मम्मा ने धीरे से दरवाज़े की ओर इशारा किया। “हमने एक चक्कर कहा था। बड़ी जड़ किसी और समय भी रहेगी।”
ऑलिव ने घर की गरम आकृति देखी और सोचा कि यह जवाब अच्छा है। आज रात के लिए उसने काफ़ी देख लिया था। दोनों लालटेन के छोटे घेरे के साथ दहलीज़ तक लौट आईं।
रोशनी को आराम

भीतर नीला कंबल ठीक वहीं इंतज़ार कर रहा था जहाँ ऑलिव ने छोड़ा था। उसने लालटेन मम्मा को लौटाई, फिर पैर मुलायम तहों में समेट लिए। वे पहले से ज़्यादा गरम लगे।
मम्मा ने लालटेन छोटे लकड़ी के स्टैंड पर सुरक्षित रखी और बुझा दी। कमरा बदला, मगर गायब नहीं हुआ। चाँदनी अब भी गोल खिड़की को छू रही थी। ऑलिव को मम्मा के चेहरे का घेरा और कंबल का जाना-पहचाना किनारा दिखता था।
“पूरा हो गया?” उसने धीमे पूछा।
“हमारा चक्कर? हाँ।”
ऑलिव ने उस छोटे, पूरे जवाब को सुना। आज रात अब कोई अगली जगह नहीं थी जहाँ उसे जाना हो।
सुबह तक

बाहर कोई पत्ती फिर पलट सकती थी। फ़र्न पर पानी की एक और बूँद बन सकती थी। जंगल अपने छोटे रात के काम करता रह सकता था, बिना ऑलिव के हर चीज़ जाँचे।
वह मम्मा के और पास सिमट गई। “कल हम बड़ी जड़ देख सकते हैं।”
“कल,” मम्मा ने फुसफुसाया।
अभी नीला कंबल था, गोल खिड़की थी और पास किसी की धीमी साँसों की आवाज़। ऑलिव की आँखें बंद हुईं। एक बार खुलीं तो मम्मा अब भी वहीं थीं। फिर बंद हो गईं। शीशे के पार चाँद अपनी जगह था। खोखले पेड़ के भीतर नन्ही उल्लू बच्ची को अब कोई और चक्कर नहीं लगाना था। समाप्त।
About this Neutoons edition
An original Neutoons story, illustrated for shared reading in English and Hindi.
Neutoons English and Hindi text. AI-generated illustrations. Animated illustrations are available in the page-turning reader. The ten-page edition has no audio narration.



