चाँद के लिए टिफ़िन
आशा चाँद के लिए खेल-खेल में खाना सजाती है। इंतज़ार करते हुए उसे चीकू के साथ चुपचाप बैठने का मज़ा मिलता है।
मुफ़्त पढ़ें · दस सचित्र पन्ने · खाते की ज़रूरत नहीं
चाँदी की मुसकान

आशा ने नीले, तारों वाले पजामे पहन लिए थे, मगर अभी अंदर जाने का मन नहीं था। छत के ऊपर दूज का चाँद चाँदी की मुसकान जैसा था। गमलों की लंबी परछाइयाँ थीं। खुले दरवाज़े की गरम रोशनी फर्श पर चौकोर जगह बना रही थी।
चीकू उसके किनारे बैठा था। उसका एक भूरा कान आशा की ओर था।
“सबने खाना खा लिया,” आशा बोली। फिर ऊपर देखा। “लगभग सबने।”
वह अपना गोल लाल टिफ़िन लाई और छोटी मेज़ पर रख दिया। चीकू पास आया। इस समय टिफ़िन निकले तो जाँच बनती थी, भले ही खरगोश खाना खा चुका हो।
पन्ना या चर्चा चुनें
चाँद क्या खाता होगा?

आशा ने डिब्बा खोला। चीकू ने खाली बीच का हिस्सा सूँघा, फिर ऐसे उम्मीद से उसे देखा जैसे गाजर मिलने वाली हो।
“तुम्हें क्या लगता है, चाँद क्या खाता होगा?” उसने पूछा।
चीकू ने जवाब नहीं दिया। उसकी नाक ने फिर सूँघा।
आशा ने चावल की बहुत बड़ी थाली सोची। लेकिन चाँद इतनी दूर था कि थाली कैसे पहुँचती? शायद खेल वाला छोटा खाना ठीक रहे। चाँदनी में रखकर देख सकते थे।
“यह खेल है,” उसने चीकू से कहा। “खरगोश का खाना नहीं।”
चीकू पीछे बैठ गया। बात अब कम उम्मीद वाली थी, मगर आशा बड़ी व्यस्त लग रही थी।
खेल वाली रसोई

गमले के पास आशा को एक गिरी पत्ती, तीन छोटी टहनियाँ और चिकना कंकड़ मिला। उसने उँगलियों से साफ़ करके सब मेज़ तक लाया।
पत्ती का चीला बन सकता था। तीन टहनियाँ सेवइयाँ थीं। कंकड़ बढ़िया आलू लग रहा था, बस कोई काटने की कोशिश न करे।
चीकू थोड़ी दूर से देख रहा था। वह कुछ भी नहीं चबा रहा था।
आशा ने जगह तय करने से पहले तीनों चीज़ें खुले डिब्बे के पास रखीं। चाँद शायद काँटा नहीं इस्तेमाल करता होगा। उसे लाने की ज़रूरत नहीं थी। खेल-खेल के खाने की सारी चीज़ें मिल गई थीं।
चाँदनी में टिफ़िन

उसने पत्ती धीरे से डिब्बे में रखी, पास तीन टहनियों वाली सेवइयाँ और किनारे कंकड़ का आलू। बिना ढक्कन लगाए सब ठीक समा गया।
फिर आशा ने टिफ़िन मेज़ पर चाँदनी वाली जगह में रखा। थोड़ा घुमाया ताकि चाँद तीनों चीज़ें देख सके।
“खाना तैयार है,” उसने धीरे से कहा।
चीकू ने ऊपर चाँदी के चाँद को देखा। चाँद ने न नीचे देखा, न सिर हिलाया, न पास आया। आशा ने ठोड़ी के नीचे हाथ रख लिए। शायद आसमान से आने में रसोई से आने से ज़्यादा वक्त लगता होगा।
मेहमान का इंतज़ार

आशा ने पाँच धीमी साँसें गिनीं। फिर छत के पास दिखते तारे गिने। चाँद छत के ऊपर वहीं था, जहाँ चाँद को होना चाहिए।
उसने टिफ़िन थोड़ा और रोशनी में सरकाया। फिर भी कुछ नहीं हुआ।
चीकू कान नीचे करके मेज़ के पास बैठ गया। उसे अब गाजर की उम्मीद नहीं थी। आशा को अभी भी मेहमान की थोड़ी उम्मीद थी।
“शायद सुना नहीं,” उसने कहा। दोबारा पुकारने लगी, फिर पास की अँधेरी खिड़कियाँ देखीं। देर हो रही थी। किसी को ऊँची आवाज़ वाला बुलावा नहीं चाहिए था। उसने हाथ चुपचाप मेज़ पर रख दिए।
शायद दूसरी बात हो

आशा चीकू के पास बैठ गई। यहाँ से चाँद सबसे ऊँचे पौधे की दो पत्तियों के बीच छोटा दिख रहा था। टिफ़िन मेज़ पर वैसा ही रखा था।
“शायद इसे भूख नहीं,” उसने आखिर कहा। “शायद चाँद खाने पर आते ही नहीं।”
चीकू उसके पैर से सट गया। पजामे के ऊपर से भी उसका फर गरम लगा। योजना बदलने से वह निराश नहीं लग रहा था।
आशा ने घुटने समेटकर उन पर ठोड़ी रख ली। अब उसे चाँद के कुछ करने का इंतज़ार नहीं करना था। वह तो पहले से गमलों, रेलिंग और उन दोनों के ऊपर चमक रहा था।
पंखों वाला छोटा मेहमान

दरवाज़े की गरम रोशनी के सामने से एक पतंगा गुज़रा। उसके पंख हल्के दिखे, फिर गहरे, फिर हल्के। आशा की आँखें उसके पीछे गईं। चीकू का एक कान उठा।
पतंगा थोड़ी देर दीवार पर बैठा, खेल वाले खाने से दूर। फिर उड़ा और गमले के पार अँधेरे में चला गया।
“कोई तो आया,” आशा ने फुसफुसाया।
आसमान को इतना ध्यान से देखते हुए वह उसे लगभग चूक गई थी। अब उसे फर्श पर हिलती पत्ती की परछाईं और टखनों पर ठंडी हवा भी महसूस हुई। इंतज़ार में छत खाली नहीं थी। वह बस बहुत दूर देख रही थी।
बिना खाने के साथ

आशा और चीकू कुछ देर और बैठे रहे। न साँसें गिनीं, न टिफ़िन खिसकाया। चीकू ने पंजे अपने नीचे समेट लिए। आशा का हाथ इतना पास था कि उसकी मूँछें उँगलियों से लगती थीं।
रेलिंग के ऊपर चाँद का चाँदी वाला किनारा साफ़ था। उसे मुसकराकर जवाब देना या खाने का धन्यवाद करना ज़रूरी नहीं था।
“हम बस बैठ सकते हैं,” आशा ने कहा।
अभी न कुछ सजाना था, न किसी को बुलाना। पीछे गरम दरवाज़ा इंतज़ार कर रहा था। जब जम्हाई से आँखों में पानी आया, उसे समझ आया कि अब रात को अपनी शांत जगह छोड़ने का समय है।
हर चीज़ अपनी जगह

अंदर जाने से पहले आशा ने खेल वाला खाना निकाला। पत्ती और तीनों टहनियाँ उसी गमले में लौटा दीं जहाँ मिली थीं। चिकना कंकड़ हथेली में रख लिया।
असली खाना रखने से पहले डिब्बा साफ़ करना था। आशा ने उसे साफ़ करके सुखाया और गोल लाल ढक्कन लगा दिया। फिर भीतर ले आई।
चीकू धीरे-धीरे पीछे आया। एक बार उसने मुड़कर देखा। चाँद अब भी छत के ऊपर था।
“वह हमसे ज़्यादा देर बाहर रह सकता है,” आशा ने कहा। उसने कंकड़ खिड़की की चौखट पर रखा, जहाँ चाँदनी की पतली पट्टी उस तक पहुँच सकती थी।
शुभरात्रि, चाँद

टिफ़िन आशा के बिस्तर के पास अगले दिन के लिए तैयार था। चीकू गद्दी पर गोल होकर सो चुका था। उसका भूरा कान सफ़ेद कान पर मुड़ा था।
आशा ने कंबल ऊपर किया। खिड़की से कंकड़, आसमान का छोटा हिस्सा और वही चाँदी का चाँद दिख रहा था। उसने उस खाने को याद किया जो किसी ने नहीं खाया, और उस मेहमान को जिसे वह लगभग देख नहीं पाई थी।
कल डिब्बे में साधारण खाना होगा। आज उसने दोस्त के साथ बाहर बैठने का बहाना दिया था।
“शुभरात्रि, चाँद,” उसने फुसफुसाया। फिर चीकू की सोती हुई नरम आकृति की ओर मुड़कर आँखें बंद कर लीं। समाप्त।
About this Neutoons edition
An original Neutoons story, illustrated for shared reading in English and Hindi.
Neutoons English and Hindi text. AI-generated illustrations. Animated illustrations are available in the page-turning reader. The ten-page edition has no audio narration.



