पतंग का अनचाहा यात्री
तारा और देव की पतंग में एक छोटा यात्री छिपा है। उड़ान से पहले उसे सुरक्षित जगह पहुँचाना ज़रूरी है।
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नारंगी चौकोर पैबंद

पतंग रात भर बगीचे के फाटक के पास रखी रही थी। कल एक टहनी से उसके नीले हिस्से में छोटा छेद हो गया था। तारा ने अगली उड़ान से पहले उसे ठीक करने का वादा किया था।
देव ने ढाँचा स्थिर पकड़ा और तारा ने छेद पर नारंगी चौकोर पैबंद दबाया। “ज़्यादा गोंद नहीं,” उसने याद दिलाया, हालाँकि उसने पहले ही बहुत कम लगाया था। तारा ने एक उँगली से कोने समतल किए। सुनहरे हिस्से सुबह की रोशनी में चमके। पैबंद सूखने पर पतंग फिर हवा के लिए तैयार होगी। देव के जूते तो अभी से मैदान की ओर मुड़ रहे थे।
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ऊपर से पूँछ तक जाँच

पैबंद सूखते समय उन्होंने बाकी पतंग जाँची। तारा ने ढाँचे पर उँगली फेरी। देव ने नीली पूँछ सीधी की और पीले फ़ीते की गाँठें गिनीं, ताकि कोई डोर में उलझी न रह जाए।
पूँछ का आखिरी हिस्सा समतल नहीं हो रहा था। फ़ीते की एक गाँठ के नीचे मुड़ी पत्ती फँसी थी। फाटक के पार शहतूत की वही झाड़ी थी जहाँ कल उड़ाने के बाद पतंग टिकी थी।
“यह कुछ साथ ले आई,” देव ने कहा। उसने पूँछ को झटकने के बजाय धीरे से उठाया। तारा ने पतंग फिर बेंच पर रख दी। मैदान कहीं जा नहीं रहा था। एक और जाँच से वह गायब नहीं हो जाएगा।
पत्ती से किसी ने झाँका

देव ने मुड़ी पत्ती का किनारा छुआ। भीतर कुछ हिला। एक नन्हा हरा सिर निकला, फिर इल्ली का अगला हिस्सा। देव बिल्कुल स्थिर हो गया।
“तारा। हमारी पत्ती के अंदर कोई है।”
वह पास झुकी, मगर चेहरा पत्ती से नहीं लगाया। इल्ली ने आगे बढ़कर फ़ीता छुआ, फिर अपने पत्ती वाले कमरे में लौट गई। वह पूँछ की गाँठ से भी बहुत छोटी थी।
देव ने मैदान के ऊपर फैला आसमान देखा। एक पल पहले वह कितना अच्छा लग रहा था। अब उसने उस नन्हे जीव को ज़मीन से बहुत ऊपर लटकते सोचा, जहाँ उतरने की कोई जगह नहीं होती।
उड़ने की इच्छा नहीं

“इसने शायद उड़ने को नहीं कहा था,” देव ने कहा।
तारा ने सिर हिलाया और चरखी बेंच पर रख दी। छोटे यात्री को सुरक्षित जगह मिलने तक वे पतंग नहीं उड़ाएँगे। उसने फँसी पत्ती के पास पूँछ पकड़ी, ताकि उसका वज़न इल्ली के घर को न खींचे।
देव लगभग पत्ती खींचने लगा, फिर उसने बीच पर दबा फ़ीता देखा। पत्ती किसी जादू से नहीं फँसी थी। पूँछ मुड़ने पर एक पीले फ़ीते की गाँठ उसके चारों ओर कस गई थी। उस गाँठ को ढीला करें तो पत्ती बिना फाड़े निकल सकती थी। पहले उन्हें अपने हाथ सही जगह रखने थे।
खींचना नहीं, ढीला करना

तारा ने पूँछ स्थिर रखी। देव ने गाँठ का एक फंदा थोड़ा-थोड़ा बड़ा किया। फ़ीता पत्ती की चिकनी बाहरी सतह पर सरका। भीतर इल्ली चुप रही।
फंदा काफ़ी बड़ा हुआ तो देव ने नीचे से सहारा देते हुए पत्ती उसमें से निकाल ली। कुछ नहीं फटा। पीले फ़ीते की गाँठ अब भी पूँछ पर थी और छोटा हरा यात्री अपने कमरे के भीतर।
“एक पत्ती बच गई,” देव ने फुसफुसाया। मगर हाथ में पत्ती पकड़ना उसे घर मिल जाने जैसा नहीं था। तारा ने शहतूत की झाड़ी की ओर देखा। “इसे वहीं के पास रखते हैं जहाँ से आया था।”
सही पत्ती

शहतूत की झाड़ी पर बहुत पत्तियाँ थीं। कुछ देव के सिर से भी ऊपर थीं। एक नीची पत्ती बुरी तरह फटी थी। तारा ने तेज़ धूप से बची एक नीची डाल की स्वस्थ पत्ती चुनी। वह अभी उसी झाड़ी पर लगी थी।
उसने नीचे से हल्का सहारा दिया और देव मुड़ी पत्ती पास लाया। “इसे पूरा रास्ता उठाकर नहीं ले जाना पड़ेगा,” उसने कहा। “कब आगे बढ़ना है, यह खुद चुन सकता है।”
देव ने मुड़ा किनारा ताज़ी पत्ती से लगाया। दोनों सतहें छू गईं और नन्हा पुल बन गया। फिर दोनों बच्चे स्थिर होकर देखने लगे कि उनका यात्री क्या करता है।
हर नन्हा पैर

काफ़ी देर कुछ नहीं हुआ। देव की बाँह थकने लगी। तारा पास आई ताकि पत्ती को झुकाए बिना उसकी कलाई को सहारा दे सके।
आखिर इल्ली आगे बढ़ी। अगले पैर नई सतह तक पहुँचे। फिर बीच का हिस्सा आया और सबसे पीछे का हिस्सा खाली जगह पार कर गया। देव खुशी से बोलना चाहता था, मगर उसने हर नन्हे पैर के नई पत्ती पर सुरक्षित पहुँचने तक इंतज़ार किया।
तभी उसने खाली मुड़ी पत्ती हटाई। इल्ली आराम से हरे किनारे की ओर मुड़ी। तारा ने डाल के नीचे से हाथ हटा लिया। उनका यात्री बगीचा छोड़े बिना अपनी जगह पहुँच गया था।
अब सचमुच तैयार

बेंच पर लौटकर तारा ने नारंगी पैबंद जाँचा। सूख गया था। देव ने नीली पूँछ सीधी की और पीले फ़ीते की ढीली गाँठ फिर बाँधी। उसका आकार बाकी जैसा ही रखा। अब न पत्ती थी, न डोर में गाँठ, न कोई यात्री।
दोनों मिलकर पतंग फाटक के पार ले गए। पेड़ों और तारों से दूर खुले मैदान में तारा ने ढाँचा पकड़ा और देव ने थोड़ी डोर छोड़ी।
हवा ने हल्का खिंचाव दिया। तारा ने छोड़ा और नीली-सुनहरी पतंग ऊपर उठी। आसमान में नारंगी चौकोर पैबंद छोटी चमकीली खिड़की जैसा लगा। इस बार ऊपर जाने वाली हर चीज़ को वहीं जाना था।
नन्हा निवाला

परछाइयाँ लंबी होने तक पतंग उड़ती रही। हवा धीमी हुई तो बच्चों ने उसे सावधानी से नीचे उतारा और डोर चरखी पर लपेटी। घर लौटते समय देव ने पूँछ को ज़मीन से ऊपर रखा।
बगीचे के फाटक पर वे धीरे हो गए। शहतूत की ताज़ी पत्ती वहीं थी। उसके किनारे से एक नन्हा घुमावदार टुकड़ा गायब था। उनकी इल्ली अगला टुकड़ा खा रही थी।
“इसे रसोई मिल गई,” देव ने फुसफुसाया। तारा उसके पास बैठ गई। अब डाल छूने की कोई ज़रूरत नहीं थी। थोड़ी देर केवल देखना काफ़ी था। पास पतंग सुरक्षित रखी थी और उसकी पूँछ में कोई पत्ती नहीं थी।
दो अच्छी यात्राएँ

“उड़ान अच्छी रही?” देव ने पत्ती की ओर फुसफुसाकर पूछा।
“खाना अच्छा रहा,” तारा ने जवाब दिया। दोनों धीमे से मुसकराए। उनकी दोपहर शुरू होने में उम्मीद से ज़्यादा देर लगी थी। मगर झाड़ी के पास बिताया समय भी अब उसका उतना ही हिस्सा था जितना खुले आसमान के नीचे बिताया समय।
तारा ने ढाँचे से पतंग उठाई। भीतर ले जाने से पहले देव ने पूँछ एक बार फिर जाँची। कल वे शायद फिर उड़ाएँगे। पहले ध्यान से देखेंगे कि ज़मीन से क्या उठा रहे हैं। पीछे छोटा यात्री ठीक वहीं रहा जहाँ वह रहना चाहता था। समाप्त।
About this Neutoons edition
An original Neutoons story, illustrated for shared reading in English and Hindi.
Neutoons English and Hindi text. AI-generated illustrations. Animated illustrations are available in the page-turning reader. The ten-page edition has no audio narration.



