बारिश का नन्हा संगीत
खेल के समय बारिश आ जाए तो? तुम्बी और किकी पत्तियों, जड़ों और बूँदों के बीच एक नया खेल ढूँढ़ लेते हैं।
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जिस खेल को रुकना पड़ा

तुम्बी ने दोपहर के खेल के लिए जंगल में सबसे खुली जगह चुनी थी। वह बरगद की जड़ों के चारों ओर चलता और किकी बताती कि कौन-सी जड़ सोते हुए साँप जैसी दिखती है। खेल शुरू ही हुआ था कि एक बड़ी बूँद उसकी आँखों के बीच गिरी।
दूसरी बूँद किकी के नीले पंख पर पड़ी। फिर पूरी खुली जगह बारिश से भर गई। हाथी का बच्चा पेड़ के नीचे पहुँचा, ध्यान रखते हुए कि छोटी दोस्त उसके पैरों के पास न आ जाए। किकी उड़कर पास की सूखी जड़ पर बैठ गई। खेलने की दोपहर अब इंतज़ार की दोपहर बन गई थी। तुम्बी को इंतज़ार पसंद नहीं था।
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आह के पीछे की आवाज़

तुम्बी ने जड़ों की ओट में पैर मोड़कर बैठते हुए लंबी साँस छोड़ी। पास धातु की एक पुरानी बाल्टी रखी थी। पत्तियों के बीच की जगह से पानी उसमें टपक रहा था।
“हम कितनी देर खेल सकते थे,” उसने कहा।
किकी ने सिर तिरछा किया। “तुमने सुना?”
“मेरी आह?”
“तुम्हारी आह के बाद।”
तुम्बी सुनने लगा। पत्ती की नोक पर एक बूँद बनी। थोड़ी देर लटकी, फिर गिरी। टप। उसके पीछे दूसरी आई। टप। उसने नोक को फिर भरते देखा। उनके इंतज़ार करते समय पत्ती अपना काम कर रही थी, भले ही वह कुछ नहीं कर रहा था।
पत्ती और धातु

बाल्टी में एक बूँद गिरी। टुन! तुम्बी ने पत्ती से धातु के किनारे की ओर देखा। “इसकी आवाज़ ज़्यादा चमकीली है।”
किकी ने अगली दो बूँदें सुनीं। एक चौड़ी पत्ती पर गिरी, दूसरी बाल्टी में। थप। टुन। बारिश एक ही थी, पर जिन चीज़ों को छूती, उनके जवाब अलग होते।
तुम्बी ने आँखें बंद कीं। क्या बिना देखे भी वह उन्हें पहचान पाएगा? उसने बिल्कुल सही समय पर सूँड़ बाल्टी की ओर की। किकी ने सिर हिलाया। तभी तुम्बी की सूँड़ की नोक पर बूँद गिरी। उस आवाज़ की उम्मीद दोनों में से किसी को नहीं थी।
कुछ ज़्यादा ही गीला बाजा

तुम्बी के कान की तह पर पानी जमा हो गया था। उसने बिना सोचे खुशी से कान झटक दिया। छपाक! बूँदें किकी की ओर उड़ीं। वह झट से जड़ के दूसरे सिरे पर फुदक गई।
तुम्बी ने पहले एक आँख खोली, फिर दोनों। “माफ़ करना। मैंने पहले देखा नहीं।”
किकी ने एक गीला पंख झटका। “इस बाजे को थोड़ी बड़ी जगह चाहिए।”
उसने दूसरी ओर खाली ज़मीन देखी। अगला कान वहीं झटका जा सकता था, उसकी बैठने की जगह से दूर। पहले उसने पूछा, “वहाँ आराम से बैठी हो?” किकी एक छोटा कदम हटी और सिर हिलाया। अब उसे पता था कि छींटे किधर नहीं भेजने हैं।
छोटी साथी की जगह

किकी को एक नीची डाल पर सूखी टहनी मिली। उसने चोंच से हल्की थपकी दी। टिक। तुम्बी इतना खुश हुआ कि चिंघाड़ने लगा, पर आधी उठी सूँड़ रोक ली। उसकी चिंघाड़ में किकी की छोटी आवाज़ खो जाती।
उसने सूँड़ की नोक से जड़ को छुआ। धुप। किकी ने जवाब दिया, टिक। वह रुका, फिर उसने जवाब दिया। दोनों आवाज़ें बराबर तेज़ नहीं थीं, इसलिए उसने और हल्की थपकी दी। इस बार किकी का जवाब साफ़ सुनाई दिया। ऊपर बारिश थपथपाती रही और नीचे वे साथ बजाने का तरीका ढूँढ़ते रहे।
कटोरा बोला टोक

बाल्टी के पास मिट्टी का पुराना कटोरा रखा था। तुम्बी को याद था कि धूप वाले दिनों में चिड़ियाँ उससे पानी पीती थीं। आज बूँदों की धार उसके थोड़ा बगल में गिर रही थी।
उसने कटोरे को धीरे से बूँदों के नीचे सरकाया और सूँड़ हटा ली। टोक। दोनों ने अगली बूँद का इंतज़ार किया। टोक।
“एक और साथी मिल गया,” किकी ने फुसफुसाकर कहा।
कटोरे की आवाज़ बाल्टी की टुन से अलग थी। तुम्बी सब कुछ पास लाना चाहता था, मगर किकी को उनके बीच की जगह अच्छी लगी। डाल से उसे साफ़ पता चलता था कि कौन-सी आवाज़ कहाँ से आ रही है। उन्होंने बाजों को वहीं रहने दिया।
बारिश के लिए बारी

पहले तुम्बी हर अच्छी लगने वाली आवाज़ पर थपकी देने लगता। किकी भी बजाती। उनकी टिक और धुप, टुन और टोक के ऊपर गिरने लगीं। कोई किसी की आवाज़ समझ नहीं पा रहा था।
दोनों एक साथ रुक गए। बारिश उनके बिना भी मज़े से बजती रही।
किकी ने टुन का इंतज़ार किया, फिर एक टिक जोड़ी। तुम्बी ने कटोरे की टोक के बाद धुप से जवाब दिया। अपनी बारी के बीच वे सुनते रहे। कभी कोई पत्ती अचानक शामिल हो जाती। उन्होंने उसके लिए भी जगह छोड़ी। तुम्बी अब कम आवाज़ें बना रहा था, पर ज़्यादा सुन पा रहा था। बारी आने तक उसकी सूँड़ घुटने पर टिकी रही।
बदलती लय

बारिश हल्की होने लगी। जो बूँदें पहले एक-दूसरे के पीछे दौड़ रही थीं, अब उनके बीच लंबी चुप्पी आने लगी। तुम्बी उस चुप्पी में तीन जल्दी थपकियाँ भरने वाला था, फिर उसने किकी को इंतज़ार करते देखा। वह भी रुका।
गीली पत्तियों में हवा चली। एक डाल ने थोड़ी बौछार गिराई, दूसरी स्थिर रही। उनकी धुन दो बार एक जैसी नहीं हो सकती थी, चाहे वे उसे कितना ही याद रखें।
“इसे तेज़ करें?” तुम्बी ने पूछा।
किकी ने खुलते आसमान को देखा। “मुझे लगता है, यह धीमा हिस्सा है।” इसलिए उन्होंने धीमा हिस्सा बजाया—एक बार में एक छोटा जवाब।
एक आखिरी टुन

धूप खुली जगह तक पहुँची। जहाँ उनका खेल शुरू हुआ था, वहाँ जड़ों पर पानी चमक रहा था। तुम्बी ने उठने के लिए एक पैर खोला, मगर किकी ने बाल्टी के ऊपर की पत्ती की ओर चोंच की।
उसकी नोक पर एक गोल बूँद लटकी थी। दोनों उसे भारी होते देखते रहे। वह काँपी, उसमें धूप चमकी और वह छूट गई। टुन।
किसी ने उसके बाद कोई आवाज़ नहीं जोड़ी। एक पल बस उनके चारों ओर जंगल की साँस थी। फिर तुम्बी धीरे से उठा। कटोरा और बाल्टी वहीं रहे। किकी उसके कंधे पर आ बैठी। “तो अब बताओ,” उसने कहा, “कौन-सी जड़ सोता हुआ साँप थी?”
कुछ अलग-सी दोपहर

टेढ़ी जड़ अब भी साँप जैसी लगती थी। मगर तुम्बी को उसके पास दूसरी चीज़ें भी दिखीं—थप कहने वाली चौड़ी पत्ती, पानी रोकने वाला गड्ढा, और किकी को जवाब देने वाली टहनी। वे बारिश से पहले भी थीं। उसने बस उन्हें ध्यान से सुना नहीं था।
वह पानी के छोटे गड्ढे से बचकर चला और उनका पुराना खेल शुरू हुआ। किकी ने उसके कंधे से एक नया आकार बताया। पीछे बाल्टी में आसमान का छोटा टुकड़ा चमक रहा था। फिर कभी बारिश खेल रोकती, तो उन्हें पता था कि उनका संगीत कहाँ मिलेगा। अभी तो धूप वाली खुली जगह में बहुत कुछ देखना था। समाप्त।
About this Neutoons edition
An original Neutoons story, illustrated for shared reading in English and Hindi.
Neutoons English and Hindi text. AI-generated illustrations. Animated illustrations are available in the page-turning reader. The ten-page edition has no audio narration.



